भूतिया मकान

1
18

यह कहानी एक सच्ची घटना पर आधारित है इस कहानी के पात्र के नाम,स्थान बदला जा रहा है जिसका जीवित या मृत्य व्यक्ति से कोई सम्बन्ध नहीं है अगर इसका सम्बन्ध किसी व्यक्ति से निकलता है तो उसे मात्र एक संयोग कहा जायेगा I

यह घटना आज से 27 वर्ष पहले कि बात है बहराईच के नानपारा कि है, जहा पर मेरे पिता जी कि नौकरी लगी और वो किराये पर मकान ढूंढ रहे थे तो पता चला कि इस कसबे में चार फलेट थे जो अगल बगल ही थे जिसमे एक फलेट खाली था हम सब उसमे रहने लगे पडोसीयों से अच्छी दोस्ती हुयी एक दुसरे के घर भी आना जाना हुआ सभी से मधुर सम्बन्ध हो गया २ वर्ष बीत जाने के बाद बगल पडोसी दीना नाथ जी के चपराशी ने उनकी पत्नी को बताया कि साहब ने दूसरी शादी कर ली है और साहब कि दूसरी पत्नी भी इसी शहर में है साहब नाईट ड्यूटी के बहाने दूसरी पत्नी के पास चले जाते है फिर क्या घर में कलेश शुरू हो गया दीना नाथ जी कि पहले वाली पत्नी के दूसरी पत्नी के साथ रंगे हाथ पकड़ लिया अब मामला और गंभीर होता चला गया एक दिन दीना नाथ और उनकी पहली पत्नी के बीच मार पीट शुरू हो गया पूरे पडोसी घर के बहार जमा हो गए उसी रात उनकी पहली पत्नी ने जहरीला पदार्थ खा कर हाथ कि कलाई काट ली और खून से दीवाल पर लिखा कि मै आज के बाद किसी को चैन से रहने नहीं दूंगी दीना नाथ जी ने उनका अंतिम संस्कार कर दिया पुलिस तहकीकात हुयी दीना नाथ जी निर्दोष साबित हुए और कुछ दिन बाद मकान खाली कर दूसरी पत्नी के पास रहने लगे उसी डर से उस मकान के पास से लोगों ने गुजरना बंद कर दिया एक पुलिस महोदय को मकान कि जरुरत थी और मकान मालिक को किराये दार कि तो मकान मालिक ने उस मकान को पुलिस को दे दिया उनसे जी अच्छी पहचान बनी पिता जी ने सभी बात बताई तो पुलिस अंकल ने कहा कि खाकी वर्दी देख कर भूत प्रेत भी भाग जाते है पुलिस अंकल अपना सामान लेकर आये और रहने लगे अभी एक रात भी नहीं गुजरी कि उनके चीखने कि आवाज जोर से आई और वो रात को ही बनियान और जांघिये में मकान से निकल भाग गए उनके साथ क्या हुआ था वही बता सकते थे पर उन्होंने किसी को कुछ नहीं बताया और मकान से सामान लेने भी नहीं आये, कई किरायेदार आए पर रात होते ही भाग जाते थे तभी से वो मकान बंद रहने लगा फिर पड़ोसियों पर क़यामत बरसने लगा वो गर्मी का दिन हमे बखूवी याद है जब हम और मेरे भाई बहन पढने के लिए लैम्प जलया तो कुछ समय बाद लैम्प बुझ गया फिर लैम्प जलाने किचन कि तरफ गए तो देखा कि लैम्प खुद जल गया यह वाकया रोज होने लगा पिता जी इसे हम लोगो का सरारत समझी और लैम्प लेकर जलाने चले ही थे कि रास्ते में अचानक लैम्प जल गया और वो पूरी तरह से घबरा गए पूरा बदन पसीने से भीग गए यह खौफ नाक मंजर एक दिन का नहीं रोज का था एक रोज कि बात है सब भाई बहन कमरे में पढाई कर रहे थे और पिता जी कुर्सी पर बैठ कर हम सबको देख रहे थे माँ पास में ही किचन था खाना बना रही थी खाना तैयार भी हो चूका था तभी अचानक लाइट एस्पार्क करने लगा और लाइट चली गयी तभी माँ लैम्प जला कर ले आई और पापा के पास बैठ गई हम सब ने १०:३० पढना बंद कर दिया और माँ पापा के साथ खाना खाने चले गए जब माँ खाना परोसने गयी तो दूध, चावल रोटी दाल सब्जी सब गायब था बस एक जूठी थाली मिली जिसमे उस दुष्ट आत्मा ने खाना खाया था उस दिन पूरा परिवार सदमे में था कभी बिना बनाये खाना तैयार मिलता था तो कभी बना हुआ खाना गायब हो जाता था इस मुसीबत कि घडी में कब २ वर्ष गुजर गए पता ही नहीं चला अब आदत सी बन चुकी थी रात में कभी रोने कि आवाज कभी चीखने कि कभी पायल कि झनकार ये तो रोज कि कहानी थी हम पड़ोसियों कि मुझे बिधवत याद है जिस मकान में उस औरत ने आत्महत्या कि थी मकान मालिक ने बाहर से ताला लगाया हुआ था फिर भी उस मकान से किसी के रहने कि आहाट मिल रही थी और नल भी चलता था साबुन का झाग भी निकल रहा था हद तो तब हुयी जब मेरी मामी आई तो बाहर टहलने के लिए निकली काफी वक़्त बीतने पर उनका पता नहीं चल सका तक़रीबन ३-४ घंटे बाद जब वह घर वापस आई तो पापा ने कहा भाभी कहा थी इतने समय तो मामी ने बताया कि जब वो घर से बाहर निकली ही थी तभी दीना नाथ जी कि पत्नी मिल गयी और हाल चाल होने लगा फिर मै उनके साथ उनके कमरे में चली गयी चाय पानी हुआ गप्प सडाके में ३-४ घंटे कब गुजर गए पता ही नहीं चला यह सुनकर पापा अचंभित हो गए जिसे मरे वर्षो गुजर गए हो वो भला किसी से कैसे बात कर सकता है और दूसरी बात जो मकान २ वर्षों से बंद पड़ा हो वो भला कैसे खुल सकता है पापा के विभाग के अंकल जी जो दीना नाथ जी के दूसरे तरफ रहते थे उनके बड़े बेटे का घर में ही दर्द नाक मौत हो गयी बेटे कि मृत्यु ने अंकल कि मानसिक संतुलन ख़राब होने लगा फिर उन्होंने अपना ट्रांसफर लेकर अलग शहर में चले गए फिर मेरे पिता जी को उस आत्मा ने बालकनी से धक्का दिया और वो भी आन बेड हो गए फिर माँ भी बीमार हो गयी इलाज के दौरान पता चला कि उन्हें कैंसर हो गया ऐसे में मेरे दादा जी को पता चला तो उन्होंने ने पिता जी का ट्रांसफर बलरामपुर के डी ए वी इन्टर कॉलेज में करवा दिया बलरामपुर आते ही पिता जी पूर्ण रूप से स्वथ्य हो गए और माँ का जब चेकब हुआ तो पता चला कि उन्हें कभी कैंसर था ही नहीं ए सब उस दुष्ट आत्मा का प्रकोप था आज भी वो चारो मकान बंद पड़ा है शाम होते ही लोगों का उस रास्ते से आना जाना बंद हो जाता है

ऐसे ही ताजा कहानियों के लिए बने रहिये Thebbmnews.in Subscribe करे और Well icon ko अवस्य दबाये जिससे आप को नयी कहानिया प्राप्त हो सके

लेखक – दुर्गेश प्रताप सिंह (तन्हा)

मंडल कोर्डिनेटर THE BBM NEWS

1 COMMENT

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here