इंटरनेट कानून की धारा 66ए क्या है।शोसल मीडिया और 66 ए में क्या फर्क है

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इंटरनेट कानून की धारा 66ए क्या है।शोसल मीडिया और 66 ए में क्या फर्क है

आज विचारो की आजादी को मद्देनजर बहुत महत्वपूर्ण दिन है। कोर्ट ने इंटरनेट कानून की धारा 66ए को रद्द कर दिया है, जिसके तहत सरकार सोशल मीडिया पर आपत्तिजनक कमेंट करने वालों को गिरफ्तार कर रही थी। यानि अब आपत्तिजनक कमेंट करने वाले लोग अपराधी की श्रेणी में नहीं आएंगे। कानून की मजबूत धाराओं में अब आपको जेल की हवा नहीं खानी पड़ेगी।और सुप्रीम कोर्ट ने आज सोशल मीडिया पर कमेंट करने को लेकर अहम फैसला सुनाते हुए आईटी एक्ट की धारा 66 ए को खत्म करने की बात कही है।

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सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक धारा 66ए अभिव्यक्ति की आजादी के खिलाफ है। कानून के गलत इस्तेमाल न होने की सरकार की दलील खारिज कर दी गई। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि धारा 66ए मूल अधिकार का उल्लंघन और असंवैधानिक है। अभिव्यक्ति की आजादी सर्वोपरि रहनी चाहिए। हालांकि सरकार के पास वेबसाइट ब्लॉक करने का अधिकार बरकरार रहेगा।

 

हम आपको बता दें कि साल 2012 में मुंबई में फेसबुक पर शिवसेना नेता बाल ठाकरे के खिलाफ कमेंट करने पर 2 लडकियों को गिरफ्तार किया गया था। लड़कियों की गिरफ्तारी के बाद देशभर में विरोध जताया गया था। हाल के दिनों में यूपी में एक मामला सामने आया था जिसमें एसपी नेता और अखिलेश सरकार में कैबिनेट मंत्री आजम खान के खिलाफ सोशल मीडिया पर कमेंट करने वाले एक लड़के को गिरफ्तार कर लिया गया था। असीम त्रिवेदी को सोशल मीडिया पर संसद, राष्ट्र चिह्न के खिलाफ आपत्तिजनक कार्टून बनाने के लिए गिरफ्तार किया था। ममता बनर्जी के कार्टून बनाने पर प्रोफेसर अंबिकेश महापात्रा को गिरफ्तार किया गया था। एयर इंडिया के दो कर्मचारियों की कुछ नेताओं के खिलाफ पोस्ट डालने पर गिरफ्तारी
की गई थी।

 

कानून की छात्रा श्रेया सिंघल ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर मांग की थी कि आईटी एक्ट की धारा 66ए अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला है, इस कानून के तहत तुरंत गिरफ्तारी के प्रावधान को खत्म किया जाए। इस मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने जांच के आदेश देते हुए दिशा निर्देश जारी किया था कि ऐसे मामलों में एसपी रैंक के अधिकारी ही गिरफ्तारी का आदेश दे सकते हैं। अब सुप्रीम कोर्ट कानून की इस धारा को खत्म कर दिया है।

 

केंद्र सरकार ने आईटी एक्ट धारा 66-ए को बनाए रखने की वकालत की थी। केंद्र सरकार ने मांग की थी कि एक्ट का इस्तेमाल गंभीर मामलों में किया जाना चाहिए और बड़े पुलिस अफसरों की इजाजत बिना कार्रवाई नहीं की जाए। आईटी एक्ट धारा 66-ए के तहत सोशल मीडिया पर आपत्तिजनक पोस्ट के खिलाफ पुलिस के पास गिरफ्तारी का अधिकार था। इसके तहत सोशल मीडिया पर आपत्तिजनक पोस्ट के खिलाफ 3 साल की जेल हो सकती थी।

 

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने जनता को एक बार फिर सोशल नेटवर्क पर अपनी आवाज़ उठाने की आजादी दे दी है। इस मामले में याचिका दायर करने वाली श्रेया सिंघल की लड़ाई रंग लाई है।

 

कोर्ट में भले ही सरकार का मत अलग हो लेकिन फैसला आने के बाद आईट और टेलीकॉम मंत्री ने कोर्ट के फैसले का स्वागत किया है। उन्होंने कहा कि आलोचना को अपराध के दायरे में नहीं लाया जाएगा। लेकिन कुछ राजनीतिक पार्टियां ऐसी भी हैं तो इस फैसले से बेहद नाखुश हैं, और इसे गलत ठहरा रही हैं।

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